18 वां राष्ट्रीय सम्मेलन में निषाद समाज के अधिकारों की उठी मांग
24 राज्यों के प्रतिनिधियों समेत 400 से अधिक प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा

देहरादून, 3 अक्टूबर 2026। अखिल भारतीय आदिवासी कश्यप, कहार, निषाद, भोई, केवट, कोली, धीवर समन्वय समिति का 18वां राष्ट्रीय सम्मेलन शनिवार को उत्तराखंड के देहरादून स्थित चौधरी फार्म हाउस, सेलाकुई में आयोजित किया गया। सम्मेलन में देश के 24 राज्यों से आए प्रतिनिधियों सहित 400 से अधिक केवट, कश्यप, कहार, निषाद, भोई, कैबर्त, धीवर, कोली, मल्लाह एवं संबंधित समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री सरयू केवट, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सह प्रदेश अध्यक्ष, नेशनल एसोसिएशन ऑफ फिशरमेन, प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय मछुवारा कांग्रेस तथा प्रदेश संगठन सचिव, राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस, झारखंड ने कहा कि उनके मत के अनुसार भारत के मूल आदिवासी समुदायों के इतिहास और पहचान को व्यापक रूप से समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि कोल, भील, किरात और द्रविड़ समुदायों को वे केवट-निषाद वंश से संबंधित मूल आदिवासी समुदाय मानते हैं। उनके अनुसार जल क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को कोल, जंगल क्षेत्रों में रहने वालों को भील, पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वालों को किरात तथा मैदानी क्षेत्रों में रहने वालों को द्रविड़ के रूप में देखा जाना चाहिए।
श्री केवट ने आरोप लगाया कि विभिन्न समुदायों को अलग-अलग उपजातियों में विभाजित किए जाने के कारण उनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकजुटता प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि उनके समुदायों को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों के संबंध में न्याय दिलाने के लिए व्यापक पहल की आवश्यकता है।
सम्मेलन के माध्यम से संगठन ने सरकार के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखीं। इनमें पूरे भारत में निषाद जाति की कोडिंग कर आदिवासी का दर्जा देने तथा परंपरागत मछुआरों को परिभाषित कर संबंधित समुदायों को 90 प्रतिशत अनुदान देने की मांग शामिल है।
वक्ताओं ने कहा कि परंपरागत मछुआरा समुदायों की आजीविका जल संसाधनों से जुड़ी रही है। इसलिए इनके सामाजिक, आर्थिक और आजीविका संबंधी अधिकारों के संरक्षण के लिए विशेष नीतिगत व्यवस्था की आवश्यकता है।
सम्मेलन में झारखंड से भी बड़ी संख्या में प्रतिनिधियों ने भाग लिया। झारखंड से सरयू केवट, रवि केवट, मुन्ना कापरी, दिलीप केवट, दीपक कुमार दास, गुनाधर मंडल, निखिल चंद्र दास, तुतून पंडित, पोलाब उस्ताद, खगेन्द्र दास, संजय उस्ताद सहित कुल 21 प्रतिनिधि शामिल हुए।
सम्मेलन में समुदाय की सामाजिक एकता, पारंपरिक आजीविका के संरक्षण तथा राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।



